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उस रात की कहानी, जब कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ कर भागना पड़ा…

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक-2023 और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक-2023 को ध्वनिमत से लोकसभा में पारित किया जा चुका है। केंद्र सरकार इन दोनों विधेयक के जरिए जम्मू-कश्मीर से विस्थापित हुए कश्मीरियों के अधिकार व सम्मान को लौटाना चाह रही है। लेकिन आइए, जानते हैं कि आज से वर्षों पहले घाटी में ऐसा क्या हुआ था कि हर तरीके से सक्षम व सम्मानित कश्मीरी पंडितो को इस तरह के आरक्षण की जरूरत पड़ गई।

19 जनवरी, 1990 को वो दिन, जब कश्मीर के पंडितों को अपना घर छोड़ने का फरमान जारी हुआ था। कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तो जंग 1947 से ही जारी है, लेकिन कश्मीर का माहौल बिलकुल अलग था। कश्मीरी मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों के बीच आपसी भाईचारे व प्यार की तमाम कहानियां मशहरू थीं, पर 1980 के बाद माहौल बदलने लगा था। रूस अफगानिस्तान पर चढ़ाई कर चुका था। अमेरिका उसे वहां से निकालने की फिराक में था। अफगानिस्तान के लोगों को मुजाहिदीन बनाया जाने लगा। ये लोग बगैर जान की परवाह किये रूस के सैनिकों को मारना चाहते थे। इसमें सबसे पहले वो लोग शामिल हुए जो अफगानिस्तान की जनता के लिए पहले से ही समस्या थे। क्रूर, वहशी, धर्मांध व अपराधी।

इन सबकी ट्रेनिंग पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में होने लगी। जिस कारण से वहां रह रहे लोगों से भी इनके कॉन्टैक्ट शुरू हुए और धीरे धीरे करके इन लोगों से कश्मीर के अपराधी और वहशी लोग जुड़ने लगे। इन सबको प्रेरणा मिली पाकिस्तान के शासक जनरल ज़िया से। इतने ऊंचे पद पर रहकर वो यही काम कर रहे थे। क्रूरता उनका शासन था। वहशीपना न्याय, अपराध जनता पर कर रहे थे।

जब ऐसे लोगों पर पुलिस ने कार्रवाई की तो लपेटे में बाकी मुसलमान भी आ गए। कई जगहों पर बेकसूर लोग भी फंस गये। अब धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को मौका मिल गया और वो कहने लगे कि हम पहले से ही कहते न थे कि कश्मीरी काफिर हमारे दुश्मन हैं! इन्हें यहां रहने न दिया जाए। कश्मीर में पंडित कभी भी 5% से ज्यादा नहीं थे पर पुलिस और प्रशासन में कश्मीरी पंडित ठीक-ठाक संख्या में थे। जज, डॉक्टर, प्रोफेसर, सिविल सर्वेंट ऐसे पद होते हैं जो आसानी से नजर में आ जाते हैं। तो धर्मांध लोगों को आसानी से टारगेट मिल गया। धर्म के ठेकेदार, चोर और अपराधी पहले से इन लोगों से लगे-बुझे थे। अब तो वजह मिल गई थी। सबको रेडिकलाइज किया जाने लगा।

जिस जगह में कश्मीरी पंडित सदियों से रह रहे थे, उनको घर छोड़ने के लिए कहा जाने लगा। पहले तो आस-पास के लोगों ने कश्मीरी पंडितों का समर्थन किया कि नहीं, आपको कहीं नहीं जाना है। पर बाद में कुछ तो डर और कुछ अपनी एकता की भावना से कहने लगे कि बेहतर यही होगा कि आप लोग चले यहां से चले जाएं। क्योंकि बसों में ब्लास्ट होने लगे। यूं ही गोलियां चलने लगीं। हर जगह यही धुन थी कि पंडितों को यहां से बाहर भेज देना है।

सरकार ने इस आग में एक बहुत बड़ा पलीता लगाया। 1986 में गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने बहनोई फारुख अब्दुल्ला से सत्ता छीन ली और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गये। खुद को सही ठहराने के लिए उन्होंने एक खतरनाक निर्णय लिया। ऐलान हुआ कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर भव्य शाह मस्जिद बनवाई जाएगी। तो लोगों ने प्रदर्शन किया कि ये नहीं होगा। जवाब में कट्टरपंथियों ने नारा दे दिया कि इस्लाम खतरे में है। इसके बाद कश्मीरी पंडितों पर धावा बोल दिया गया। साउथ कश्मीर और सोपोर में सबसे ज्यादा हमले हुए। जोर इस बात पर रहता था कि प्रॉपर्टी लूट ली जाए, लोगों को मार दिया जाए व उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाए। परिणामस्वरूप 12 मार्च 1986 को राज्यपाल जगमोहन ने शाह की सरकार को दंगे न रोक पाने की नाकामी के चलते बर्खास्त कर दिया।

1987 में चुनाव हुए। कट्टरपंथी हार गये। ये आखिरी मौका था, जब वहां के समाज को अच्छे से पढ़ा जा सकता था। वही मौका था, जब बहुत कुछ ठीक किया जा सकता था। क्योंकि चुनाव में कट्टरपंथ का हारना इस बात का सबूत है कि जनता अभी भी शांति चाहती थी, पर कट्टरपंथियों ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। हर बात को इसी से जोड़ दिया कि इस्लाम खतरे में है। जुलाई 1988 में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट बना। कश्मीर को भारत से अलग करने के लिए, कश्मीरियत अब सिर्फ मुसलमानों की रह गई। पंडितों की कश्मीरियत को भुला दिया गया।

14 सितंबर 1989 को भाजपा के नेता पंडित टीका लाल टपलू को कई लोगों के सामने मार दिया गया। हत्यारे पकड़ में नहीं आए। ये कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाने को लेकर पहली हत्या थी। इसके डेढ़ महीने बाद रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू की हत्या की गई। गंजू ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। गंजू की पत्नी को किडनैप कर लिया गया। वो कभी नहीं मिलीं। वकील प्रेमनाथ भट को मार दिया गया। 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या की गई। ये तो बड़े लोग थे। साधारण लोगों की हत्या की गिनती ही नहीं थी। इसी दौरान जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किये गये थे। क्यों? इसका जवाब नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार ने कभी नहीं दिया।

4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें। अखबार अल-सफा में भी यही छपा था। चौराहों और मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित यहां से चले जाएं, नहीं तो बुरा होगा। इसके बाद लोग लगातार हत्यायें औऱ रेप करने लगे। कहते कि पंडितों, यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ – असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान (हमें पाकिस्तान चाहिए, पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ।)

गिरजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ। फिर मार दिया गया। ऐसी ही अनेक घटनाएं हुईं, पर उनका कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता। एक आतंकवादी बिट्टा कराटे ने अकेले 20 लोगों को मारा था। इस बात को वो बड़े घमंड से सुनाया करता था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट इन सारी घटनाओं में सबसे आगे था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 60 हजार परिवार कश्मीर छोड़कर आस पास के राज्यों में जा बसे और अपने ही देश में शारणार्थी बन गए। 19 जनवरी 1990 को सबसे ज्यादा लोगों ने कश्मीर छोड़ा था। लगभग 4 लाख लोग विस्थापित हुए थे। हालांकि आंकड़ों के मुताबिक अभी लगभग 20 हजार पंडित कश्मीर में रहते हैं।

विस्थापित परिवारों के लिए तमाम राज्य सरकारें और केंद्र सरकार तरह-तरह के पैकेज निकालती रहती हैं। कभी घर देने की बात करते हैं। कभी पैसा। पर इन 27 सालों में मात्र एक परिवार वापस लौटा है। क्योंकि 1990 के बाद भी कुछ लोगों ने वहां रुकने का फैसला किया था। पर 1997, 1998 और 2003 में फिर नरसंहार हुए थे।