सावन का पत्रिव माह चल रहा है और आज सावन की शिवरात्रि है। सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चर्तुदशी को शिवरात्रि का उपवास किया जाता है। आज के दिन शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने से सभी पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही वह शिव कृपा का भागी बनता है।
शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार वाराणसी के जंगल में गुरुद्रुह नामक एक शिकारी रहता था। जो जानवरों का शिकार कर अपने परिजनों का पालन पोषण करता था। एक दिन शिकार करने के लिए वह जंगल गया लेकिन पूरे दिन की भाग दौड़ के बाद भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। वह भूखा प्यासा व्याकुल होने लगा। शिकार की प्रतीक्षा में वह एक तालब किनारे बेल वृक्ष पर अपना ठिकाना बनाने लगा। उसी बेल वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढका हुआ था और शिकारी इस बात से बिलकुल अनजान था।
पेड़ पर खुद के लिए ठिकाना बनाने के लिए उसने पेड़ की टहनियां तोड़ी जो संयोगवश नीचे स्थित शिवलिंग पर जा गिरी। इसके बाद शिकार की राह देखते-देखते वह पेड़ से बेलपत्र तोड़ तोड़ की नीचे गिराता रहा, ये बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर गिरते रहे। शिकारी पूरे दिन से भूखा था और जिससे उसका व्रत भी हो गया और अनजाने में उसने शिवलिंग पर बेलपत्र भी अर्पित कर दिया। इस तरह से शिकारी अनजाने में किए गए पुण्य का भागी हो गया।
रात्रि का एक पहर बीत गया, शिकारी अब भी अपने शिकार का इंतजार कर रहा था तभी एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने आई। शिकारी ने मृगी के शिकार के लिए अपनी धनुष उठाई और कमान से तीर छोड़ने ही वाला था वैसे ही मृगी बोली कि शिकारी मुझे मत मारो, मैं गर्भिणी हूं। शीर्घ ही प्रसव करूंगी। तुम अगर मुझे मारते हो तो एक साथ दो जीवों की हत्या होगी जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीर्घ ही तुम्हारे पास आउंगी तब तुम मेरा शिकार कर लेना।
शिकारी ने मृगी की बात मान ली और उसे जाने दिया। कुछ समय बाद उधर से एक और मृगी निकली। शिकारी खुश हुआ कि और उसे मारने के लिए धनुष उठाई ही थी कि मृगी बोली, ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’
शिकारी ने उसे भी जाने दिया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी खुश हुआ और धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे शिकारी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊंगी।
शिकारी हंसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।’ इस पर मृगी बोली कि ‘हे शिकारी! मेरा विश्वास करो मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़ तुरंत लौट आउंगी। शिकारी को दया आ गई और उसने अपने तीसरे शिकार को भी जाने दिया।
अब निराश शिकारी अपने अगले शिकार के इंतजार में बैठा पेड़ से बेलपत्र तोड़-तोड़ कर नीचे शिवलिंग पर फेकता रहा। इतने में उधर से एक मृग गुजरा। शिकारी ने मृग का शिकार करने की इच्छा से धनुष की प्रत्यंचा तानी ही थी कि मृग बोला, ‘हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मार दो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊंगा।’
मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। अनजाने में किए गए उपवास, रात्रि जागरण और शिवलिंग पर बेल पत्र अर्पित करने से शिकारी का हिंसक मन निर्मल हो गया था। उसका मन करुणा के भावों से भर गया था। बीते दिनों में किए गए अपने कर्मों को याद कर वह पश्चाताप की अग्नि में जलने लगा।
थोड़ी ही देर में मृग का सारा परिवार अपने वादे के अनुसार शिकार के सामने उपस्थित हुआ लेकिन शिकारी के हाथों से सहज ही धनुष छूट गया और उसने मृग के परिवार को मारने का विचार त्याग दिया। यह देखकर सभी देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की और शिकारी समेत मृग के परिवार को मोक्ष की प्राप्ति हुई।

