नई दिल्ली। मंगलवार को इंडिया गठबंधन की चौथी बैठक बुलाई गई। बैठक में 28 दल शामिल हुए। बैठक के दौरान ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने दलित कार्ड खेलते हुए प्रस्ताव दिया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को इंडिया गठबंधन के पीएम उम्मीदवार के रूप में नामित करना चाहिए। हालांकि अगर इंडिया गठबंधन खड़गे को पीएम पद का उम्मीदवार बनाती है तो भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र के अभी तक के इतिहास में कोई दलित नेता प्रधानमंत्री पद तक नहीं पहुंचा है।
भारत में आबादी का जातिगत आंकड़ा नहीं है, हालांकि अनुमानों के मुताबिक भारत में क़रीब 25 फीसदी दलित हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे दलित नेता हैं। मौजूदा राजनीति में मोदी एनडीए की तरफ से एक ओबीसी चेहरा हैं, इंडिया गठबंधन की तरफ़ से नीतीश कुमार एक ओबीसी चेहरा हो सकते थे, लेकिन नीतीश कुमार के लिए ओबीसी चेहरे के रूप में मोदी का मुक़ाबला करना आसान नहीं होगा, इसलिए अब एक नया दलित कार्ड खेला गया है क्योंकि अभी तक भारत में कोई दलित प्रधानमंत्री नहीं बना है। खड़गे को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करके इंडिया गठबंधन चुनावों को रोचक बना सकता है। हालांकि अभी इंडिया गठबंधन में पीएम पद के उम्मीदवार की अधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या खड़गे को पीएम पद उम्मीदवार बनाने के फैसले पर इंडिया गठबंधन में शामिल सभी दल एकमत होंगे या इंडिया गठबंधन में दरार पड़ जाएगी और गठबंधन बिखर जाएगा? तो आइए जानते हैं…
ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने दलित कार्ड को 12 पार्टियों ने समर्थन किया है लेकिन इस प्रस्ताव से नाराज होकर नीतीश कुमार और लालू यादव बैठक से बाहर चले गए और संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी शामिल नहीं हुए। तो वहीं हर मीटिंग में राहुल गांधी को आगे बढ़ाने वाली कांग्रेस अब धर्म संकट में फंस गई है। खड़गे को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करने पर कांग्रेस पार्टी में ही विरोध हो सकता है।
कांग्रेस और उसके संगठन के सियासी सफर पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि इस पार्टी पर सिर्फ नेहरू गांधी परिवार का वर्चस्व है। गांधी परिवार को छोड़कर कोई भी व्यक्ति अध्यक्ष या प्रधानमंत्री बनता है तो वो सिर्फ इस परिवार की कठपुतली ही हो सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। अगर मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम पर कांग्रेस सहमत होती है, तो मल्लिकार्जुन खड़े दूसरे मनमोहन साबित हो सकते हैं।
तो वहीं बात करें नीतीश कुमार की तो लंबे समय से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष का पीएम चेहरा हो सकते हैं। क्योंकि एक ओबीसी के सामने एक ओबीसी पीएम चेहरे को लाना बेहतर विकल्प हो सकता है। नीतीश कुमार का अब तक का राजनीतिक सफर बेदाग रहा है। उन्होंने बिहार में विकास की राजनीति की है और उन्हें विकास पुरुष के नाम से जाना भी जाता है। उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप भी नहीं लगा है।
नीतीश ने कभी खुलकर प्रधानमंत्री बनने की मंशा तो नहीं जताई, लेकिन उनकी पार्टी के नेता और उनके समर्थक उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए बेहतर उम्मीदवार बताते रहे हैं। जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह ने पिछले साल 2021 अगस्त में कहा था नीतीश कुमार में प्रधानमंत्री बनने की पूरी काबिलियत है। फिर खड़गे को पीएम उम्मीदवार बनाने के प्रस्ताव पर नीतीश का बैठक से बाहर चले जाना कहीं न कहीं इशारा है कि उनके मन में भी ये भावना है कि वे पीएम मोदी के सामने विपक्ष का पीएम चेहरा हो सकते हैं, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
अब रही बात लालू की तो 2008 से ही लालू के मन में पीएम बनने की इच्छा है अब जब वो इच्छा मरती हुई नजर आई तो लालू ने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। दरअसल, 2008 में यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। उस वक्त लालू यादव रेल मंत्री थे। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लालू यादव ने अपने भाषण में कहा था कि बताइए किसके मन में पीएम बनने की इच्छा नहीं है? फिर उन्होंने पीएम मनमोहन सिंह की तरफ देखते हुए कहा कि पीएम बनने की इच्छा मेरे मन में भी है।
तो अगर 2024 के चुनावों में इंडिया गठबंधन पीएम मोदी के सामने दलित कार्ड खेलने की कोशिश भी करेगी को इंडिया गठबंधन तिनके की तरह बिखर जाएगा और जिस मकसद के लिए ये गठबंधन बनाया गया है वह कभी पूरा नहीं होगा क्योंकि इस गठबंधन में हर कोई पीएम बनने की लालसा से भरा हुआ है। यहांं पर वह कहावत एक दम सटीक बैठ रही है एक अनार सौ बीमार…

