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मां भारती के लिए अपनी मां से किया वादा तोड़ा… कुछ ऐसी है हीरो ऑफ बटालिक के दिलेरी की कहानी

नई दिल्ली। कारगिल युद्ध पर जाने से पहले अपनी मां से वादा किया ​था कि अपने 25वें जन्मदिन पर घर जरूर आऊंगा और उन्होंने अपना वादा निभााया, घर आए लेकिन तिरंगे में लिपटकर।

ये कहानी है कारगिल युद्ध में अपने अदम्य साहस और नेतृत्व का परिचय देने वाले कैप्टन मनोज कुमार पांडे की। जिन्होंने युद्ध के दौरान मां भारती की आन बान शान के लिए अपनी जान तक न्योछावर कर दी। मां भारती की सुरक्षा के लिए अपनी जन्म देने वाली मां से किया वादा भी तोड़ दिया। मरणोपरांत मनोज को उनकी वीरता के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर के रुधा गांव में 25 जून, 1975 को मनोज कुमार पांडे का जन्‍म हुआ था। बचपन के कुछ साल मनोज ने अपने गांव में ही बिताए। बाद में उनका परिवार लखनऊ शिफ्ट हो गया। यहां उनका दाखिला सैनिक स्कूल में काराया गया। स्‍कूल के बाद उनके पास अपना करियर बनाने के लिए कई ऑप्‍शन थे, लेकिन उन्होंने सेना को चुना। उन्‍होंने ठान लिया था कि वे सेना में ही जाएंगे। इसलिए वे सुबह जल्दी उठते, व्‍यायाम करते इसके बाद बाकी काम। उन्‍होंने एनडीए में हिस्‍सा लिया और सफल हुए। एनडीए के इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि सेना में क्‍यों आना चाहते हो, तो उनका जवाब था मैं परमवीर चक्र जीतना चाहता हूं।

मनोज ने पुणे के पास खड़कवासला स्थित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रशिक्षण लिया और 1997 में 11 गोरखा रायफल्स रेजिमेंट की पहली वाहनी के अधिकारी बने। अधिकारी बनने के बाद उन्हें अपनी दिलेरी साबित करनी पड़ी थी। जिसके लिए दशहरे की पूजा के दौरान उनसे बलि के एक बकरे का सिर काटने के लिए कहा गया। इसे सुनकर मनोज एक क्षण के लिए तो थोड़ा विचलित हुए, लेकिन फिर उन्होंने फरसे का ज़बरदस्त वार करते हुए बकरे की गर्दन उड़ा दी। उनके चेहरे पर बकरे के ख़ून के छींटे पड़े। बाद में अपने कमरे के एकांत में उन्होंने कम से कम एक दर्जन बार अपने मुंह को धोया। वो शायद पहली बार जानबूझ कर की गई हत्या के अपराध बोध को दूर करने की कोशिश कर रहे थे।

इस झिझक और अपराध बोध से निकलने में मनोज को करीब डेढ़ साल लग गए। इस दौरान वह हमले की योजना बनाने, हमला करने और अचानक घात लगा कर दुश्मन की जान लेने की कला में पारंगत हो चुके थे।

मनोज की पहली तैनाती कश्मीर में हुई और सियाचिन में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी। उन्होंने कड़ाके की ठंड में भी बरफ़ से ढके पहाड़ों पर साढ़े चार किलो के ‘बैक पैक’ के साथ चढ़ने में महारत हासिल कर ली थी। उस ‘बैक पैक’ में उनका स्लीपिंग बैग, एक अतिरिक्त ऊनी मोज़ा, शेविंग किट और घर से आए ख़त रखे रहते थे। जब भूख लगती थी तो वो कड़ी हो चुकी बासी पूड़ियां खाते थे। ठंड से बचने के लिए ऊनी मोज़ों को दस्ताने के रूप में इस्तेमाल करते थे।

पांडे सियाचिन में तैनात थे। अचानक उनकी बटालियन को करगिल में बुला लिया गया। यहां पाकिस्तान घुसपैठ कर चुका था। मनोज ने आगे बढ़ कर अपनी बटालियन का नेतृत्व किया। दो महीने में उन्होंने कुकरथांग, जबूरटॉप जैसी चोटियों पर दोबारा कब्जा कर लिया।

मनोज को इसके बाद उन्हें खोलाबार चोटी पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मिशन का नेतृत्व कर्नल ललित राय कर रहे थे। खोलाबार सबसे मुश्किल लक्ष्य था। इस पर चारों तरफ से पाकिस्तान का कब्जा था। पाकिस्तानी ऊंचाई पर तैनात थे। यह चोटी इसलिए अहम थी, क्योंकि यह दुश्मन का कम्युनिकेशन हब था। इस पर कब्जा करने का मतलब था कि पाकिस्तानी सैनिकों तक रसद और अन्य मदद में कटौती होना। इससे लड़ाई को अपने हक में किया जा सकता था। जब भारतीय सैनिकों ने इस पर चढ़ाई करना शुरू की तो पाकिस्तानियों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। पाकिस्तानियों ने तोप से गोले और लॉन्चर भी बरसाए।

कमांडिंग अफसर के निर्देश के मुताबिक दो टुकड़ियों ने रात में ही चढ़ाई करने की योजना बनाई। एक बटालियन मनोज पांडे को दी गई। मनोज को चोटी पर बने चार बंकर उड़ाने का आदेश दिया गया। जब मनोज ऊपर पहुंचे तो उन्होंने बताया कि ऊपर चोटी पर 6 बंकर हैं। हर बंकर में 2-2 मशीन गनें तैनात थीं। ये लगातार गोलियां बरसा रहीं थीं।

मनोज पांडे जब एक बंकर में घुस रहे थे तो उनके पैर में गोली लगी। इसके बावजूद वे आगे बढ़े और हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट में दो दुश्मनों को मार गिराया। यहां उन्होंने पहला बंकर नष्ट कर दिया। लहूलुहान होने के बावजूद मनोज पांडे रेंगते हुए आगे बढ़े और उन्होंने दो और बंकरों को तबाह कर दिया।

इसके बाद एक और बंकर बचा था, जिसे नष्ट करने का उन्हें आदेश मिला था। जैसे ही मनोज पांडे उसे नष्ट करने के लिए आगे बढ़े, दुश्मन की बंदूक से उन्हें चार गोलियां लगीं लेकिन उन्होंने इसके बावजूद उस बंकर को भी उड़ा दिया। कुछ पाकिस्तानी सैनिक वहां से भागने लगे, तो उनके मुंह से आखिरी शब्द निकला, ‘ना छोड़नूं’ (किसी को छोड़ना नहीं)। इसके बाद भारतीय जवानों ने उन्हें भी ढेर कर दिया। कैप्टन पांडे की बटालियन ने खोलाबार पर कब्जा कर लिया।

कैप्टन मनोज कुमार पांडे 24 साल 7 दिन की उम्र में ही अपने देश के लिए शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत सेना का सर्वोच्च मेडल परम वीर चक्र दिया गया। उन्हें हीरो ऑफ बटालिक भी कहा जाता है।

मनोज कुमार पांडे अपनी मां से बहुत प्यार था। जब वो बहुत छोटे थे तो एक बार वो उन्हें अपने साथ मेले में ले गईं।उस मेले में नन्हे मनोज लकड़ी की एक बांसुरी ली थी। वो बांसुरी अगले 22 सालों तक मनोज ने अपने साथ रखी। वो हर दिन उसे निकालते और थोड़ी देर बजा कर अपने कपड़ों के पास रख देते। जब वो सैनिक स्कूल गए और बाद में खड़कवासला और देहरादून गए, तब भी वो बांसुरी उनके साथ थी। लेकिन कारगिल की लड़ाई में जाने से पहले मनोज अपनी बांसुरी अपनी माँ के पास रखवा गए थे।”