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युगों पुरानी है भारत में राखी की डोर, माता लक्ष्मी ने राजा बली को राखी बांध शगुन में मांगा था पति का साथ

नई दिल्ली। राखी, भाई-बहन के बीच असीम स्नेह, अगाध प्रेम और अटूट विश्वास की पावन डोर सी है। भाई की कलाई पर बंधी रेशम की डोर बहन की सुरक्षा के प्रति भाई की प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है। रक्षाबंधन को लेकर इतिहास में कई किस्से प्रसिद्ध हैं। तो आइए जानते हैं, कब किसने और किसको बांधी राखी?

बाली की बहन
जब भगवान वामन ने महाराज बली से तीन पग भूमि मांगकर उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया था, तब राजा बली ने भगवान वामन से वर के रूप में रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान को वामनावतार के बाद पुन: लक्ष्मी के पास जाना था लेकिन भगवान ये वचन देकर फंस गए और वहीं रसातल में बली की सेवा में रहने लगे। उधर, इस बात से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं। ऐसे में नारद जी ने लक्ष्मी जी को एक उपाय बताया। तब लक्ष्मी जी ने राजा बली को राखी बांध अपना भाई बनाया और शगुन के तौर पर अपने पति को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। मान्यता है कि तभी से यह रक्षाबंधन का त्योहार प्रचलन में हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की बहन
श्री कृष्ण और द्रौपदी के रिश्ते में भाई-बहन जैसा असीम स्नेह था। पौराणिक कथाओं के अनुसार शिशुपाल के वध के बाद जब श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बहा तो द्रौपदी ने अपना आंचल फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया था। जिस पर भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को बहन मानते हुए इसका ऋण चुकाने का वचन दिया था।

कहते हैं ​जब धृतराष्ट्र की भरी राजसभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर और पांडव कुछ नहीं कर पाए तो द्रौपदी ने आंखें बंद की और सहायता के लिए श्री कृष्ण को याद किया था और उन्होंने अपनी बहन की लाज बचाई थी।

यम और यमुना
इतिहास में प्रचलित एक और पौराणिक कथा ​के अनुसार रक्षाबंधन की रस्म भारत में बहने वाली नदी यमुना और मृत्यु के देवता यम द्वारा भी मनाई गई थी। एक बार यमुना ने यमराज को राखी बांधी तो मृत्यु के स्वामी ने उन्हें अमरता प्रदान की। कहा जाता है कि जो भी भाई राखी बंधवाकर अपनी बहन की रक्षा करता है वह भी अमर हो जाएगा।