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इंसानी जज्बे, विज्ञान की मदद और भगवान के आशीर्वाद ने बचाईं 41 जिंदगियां

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों…!

नई दिल्ली। इंसान ठान ले तो क्या नहीं हो सकता, ऐसी ही एक कामयाबी उत्तकाशी में देखने को मिली है। जहां इंसान ने विज्ञान की मदद और आस्था के दम पर 41 जिंदगियों को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। जी हां उत्तरकाशी की धंसी सुरंग में फंसे सभी 41 श्रमिकों को 17वें दिन बाहर निकाल लिया गया है। बचाव स्थल पर खुशी का माहौल था। मजदूरों को निकाल कर प्राथमिक उपचार के बाद एम्बुलेंस के माध्यम से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चिन्यालीसौड़ में शिफ्ट किया गया।

12 नवंबर को सुबह सुरंग धंसी थी और वहां काम कर रहे 41 मजदूर फंस गए थे। तब से उन्हें बाहर निकालने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया गया। देश ही नहीं, विदेश से भी एक्सपर्ट आए। भारी मशीनों को लगाया गया। इस दौरान बाबा बौख नाग को मनाने का दौर भी जारी रहा। आखिरकार 16 दिन बाद 41 जिंदगियां गुप्प अंधेरे से निकलकर आजाद हो गईं।

बात 12 नवंबर, 2023 की सुबह करीब 5.30 बजे की है, जब उत्तरकाशी में बन रही सिलक्यारा-डंडालगांव सुरंग हादसा हुआ और वहां काम कर रहे 41 मजदूर उसमें फंस गए। सुरंग का मलबा 60 मीटर तक फैल गया और बाहर का रास्ता बंद हो गया। वॉकी-टॉकी ने काम करना बंद कर दिया। मजदूरों को सुरक्षित निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया।

सबसे पहले सुरंग का पानी बाहर निकालने के लिए चार इंच का एक पाइप बिछाया गया। इसी के साथ वॉकी-टॉकी को सिग्नल मिला और मजदूरों से बातचीत होने लगी। मजदूरों को पाइप से कंप्रेसर के जरिए ऑक्सीजन, दवाइयां और कुछ खाने-पीने की चीजें भेजी जाने लगीं। इसके साथ ही मलबा हटाने की कोशिशें तेज हुईं। मशीन से करीब 20 मीटर तक मिट्टी हटाई गई, लेकिन ऊपर से मलबा गिरने लगा। तब मलबा हटाने की बजाय ऊपर से ड्रिलिंग करने का फैसला किया गया।

ड्रिलिंग के जरिए 900 एमएम के मोटे पाइप मजदूरों तक पहुंचाने थे। काम शुरू हुआ, लेकिन रफ्तार बहुत धीमी थी। तब सी30 हरक्यूलिस विमान से 25 टन वजनी अमेरिकी ऑगर मशीन दिल्ली से लाई गई। पहले की ऑगर मशीन हर घंटे 1 मीटर ड्रिल कर रही थी और दिल्ली से आई मशीन प्रति घंटे 5 मीटर की रफ्तार से ड्रिलिंग करने लगी। लेकिन करीब 25 मीटर तक ही पाइप डाली गई थी कि ऑगर मशीन में खराबी आ गई। अब 900 एमएम का पाइप डालना मुश्किल हो गया।

रेस्क्यू ऑपरेशन के आठ दिन हो गए थे। लेकिन कुछ खास सफलता मिलती नहीं दिख रही थी। तब पांच तरफ से ड्रिलिंग करने का फैसला हुआ। एनएचआईडीसीएल, टीएचडीसीआईएल, ओएनजीसी, आरवीएनएल और सतलुज जल विद्युत निगम जैसी संस्थाओं को इस काम में लगा दिया गया। 21 नवंबर को 6 इंच के एक पाइप को मजदूरों तक पहुंचाने में सफलता मिल गई। इस पाइप से उनके पास खाने-पीने के बेहतर साधन मुहैया होने लगे। तभी एक वक्त ऐसा आया जब लगा कि कुछ घंटों में मजदूर बाहर निकाल लिए जाएंगे। 60 मीटर के मलबे में 45 मीटर तक 800एमएम का पाइप पहुंच चुका था। बस तीन पाइप डाले जाने थे कि अमेरिकी ऑगर मशीन सीमेंट और शरिये के मजबूत जोड़ में फंसकर खराब हो गई।

तब तक विदेश से एक्सपर्ट्स भी आ गए थे। उन्होंने कहा कि अब ऑगर मशीन ठीक नहीं की जा सकती है। दो दिन ड्रीलिंग का काम रुक गया। फिर रैट माइनर्स को काम पर लगाया गया। रैट माइनर्स के जरिए हाथ से मलबा निकालने का काम शुरू हुआ। 28 नवंबर की रात विज्ञान की ताकत, इंसान की मेहनत और भगवान के आशीर्वाद ने 41 मजदूरों की जान बचा ली।